Search This Blog

Saturday, April 16, 2011

23."q tumse dil lagaye the"


Maine v pyar kiya tha kabhi,
aur thokar v khaya tha.
sochta hun ae dilnasheen,
q tumse dil lagaya tha.

Manta hun sara kusur tha mera,
par aap man bhi tho sakte the.
Ye nachiz aapka aziz hota,
ye aazma bhi sakte the.

Mai kabhi ye gam na manaun,
ki maine aapka dil toda.
mai kabhi kadam wapas na liye,
aapne hi mera daman choda.

mujhe yakeen hai apne hathon ke lakeeron par.
yaad aapko aksar aaunga.
aap aa jan kuch waqt nikal kar,
qki jald hi bahut dur chala jaunga.

Yun khush hua aapko pakar,
fir zindagi ke sare haseen pal paye the,
turant hi chal diye tum fir mudke,
fir ham gam manaye ki "q tumse dil lagaye the".

22.Manzil



Chalte Ja Rahian Hain Andhere Main Unhi
Saath Chirag Nahi JO Dikhaye Manzil Humsafa Nahi
Maqsade Zindagi Har Kisi Ka Koina Koi Hota Hai
Hamara Maqsade Zindagi Kiya Hai Hum Jante Nahi
Manzil Ki Talash Me Jo Nikle Na Manzil Mili Na Rasta
Andhera Chaya Howa Hai Harso Koi Chirag Jalta Nahi
Us Taq Punchna Asaan Nahi Jante Hain Hum
Apna Lainge Woh Rasta Jo Un Ki Rahon Se Milta Ho
Unko Chana,Chate Rehna Aik imtehan Hai
Payega Mohabbat Woh,Nafrat Ko Bhi Mohabbat Samjhe Jo.

21.चाँदनी को क्या हुआ..



चाँदनी को क्या हुआ कि आग बरसाने लगी
झुरमुटों को छोड़कर चिड़िया कहीं जाने लगी

पेड़ अब सहमे हुए हैं देखकर कुल्हाड़ियाँ
आज तो छाया भी उनकी डर से घबराने लगी

जिस नदी के तीर पर बैठा किए थे हम कभी
उस नदी की हर लहर अब तो सितम ढाने लगी

वादियों में जान का ख़तरा बढ़ा जब से बहुत
अब तो वहाँ पुरवाई भी जाने से कतराने लगी

जिस जगह चौपाल सजती थी अंधेरा है वहाँ
इसलिए कि मौत बनकर रात जो आने लगी

जिस जगह कभी किलकारियों का था हुजूम
आज देखो उस जगह भी मुर्दनी छाने लगी

20.शुक्रिया


चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया

जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया

सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया

आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया

आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया

अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया

अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे "किस्मत" रूठ के जाने का शुक्रिया

19.रोना आता है सिर्फ अपने ऊपर


हमने क्या कि थी खता
ऐ खुदा अब ये बता
क्यूँ किया उनसे दूर 
क्यूँ किया हमें मजबूर

हंस ना पाते हैं  १ पल
पता नहीं अब होगा क्या कल
अब तन्हा हुए इस सफ़र में
तलाश है १ हमसफ़र कि हमें

कुछ गलतियाँ कि थी मैंने
कुछ में थी मेरी नादानी
डरता हूँ अब अपने कल से
मिली मुझे सिर्फ बदनामी

लौटा दो मेरे उस दिन को फिर से
ये १ विनती है अब तुमसे
सर्मिन्दा हूँ बहुत जो कुछ भी मैंने किया
उन हसीं पल का तुझे शुक्रिया

अब और इम्तिहान मत लेना
फिर किसी को ये गम ना देना
मुशिकिल बहुत होती है इनमे
परीस्थी मै हूँ जिनमे

कभी कभी होता हूँ निराश
जब कभी ना पाऊं उसे अपने पास
उन प्यार भरे लम्हों का एहसास
मेरे दिल कि थी वो प्यास

अब और ना लिख सकता हूँ इनपर
भरोसा किया इतना ज्यादा जिनपर
तोड़ के दिल वो चले गए
रोना आता है सिर्फ अपने ऊपर

18.गम


अपने गम को सिने में दफ़न करके 
मुस्कुराये जाता हूँ मैं 
तनहाइयों में खुद से बातें करके
खुद को बहलाए जाता हूँ मैं 
अपने रिसते जख्मों पे 
खुद ही मलहम लगाये जाता हूँ मैं 
कितनी मुदतो से अपने आंसुओं को 
हंसी में छुपाये जाता हूँ मैं 
भले ही टूटे मेरा दिल 

तुमसे प्यार आज भी है 
तेरे लिए मेरे दिल में 

वो बहार आज भी है 
जिस राह चल दिए तुम मेरा साथ छोड़ कर 

उसी राह में तेरे आशिकी कि 
मज़ार आज भी है 


अचानक मोहब्बत कर बैठे हम 
क्या पाता था अंधेरो में कही खो जायेंगे
भुला बैठे थे अपनों को ही हम 
क्या पाता था आखिर लौट कर उनके पास ही आयेंगे

17.मुझको


जब कोई भी ना रहा कन्धा मेरे रोने को 
घर कि दीवारों ने सीने से लगाया मुझको 

यूँ तो उम्मीद-ए-वफ़ा तुम से नहीं है कोई 
फिर चिरागों कि तरह किस ने जलाया मुझको 

बेवफा ज़िन्दगी ने जब छोर दिया  है तन्हा 
मोत ने प्यार से पहलू में बिठाया मुझको 

वो दिया  हूँ जो मोहबत ने जलाया था कभी 
गम कि आंधी ने सार-ऐ-शाम बुझाया मुझ को 

कैसे भूलूंगाl वो वस्ल के लम्हे 
याद आता रहा जुल्फों का ही साया मुझ को